Monday, April 17, 2017

प्रकृति का एक वरदान है ' बरगद '

प्रकृति का एक वरदान है ' बरगद ' ये कभी नष्ट नहीं होता है बरगद का वृक्ष घना एवं फैला हुआ होता है इसकी शाखाओं से जड़ें निकलकर हवा में लटकती हैं तथा बढ़ते हुए जमीन के अंदर घुस जाती हैं एवं स्तंभ बन जाती हैंबरगद को अक्षय वट भी कहा जाता है-बरगद( Banyan ) के वृक्ष की शाखाएं और जड़ें एक बड़े हिस्से में एक नए पेड़ के समान लगने लगती हैं-
आइये जाने इसके क्या प्रयोग है-
बाल के लिए प्रयोग-
बरगद की जड़- 25 ग्राम
जटामांसी का चूर्ण- 25 ग्राम
गिलोय का रस- 2 लीटर
तिल का तेल- 400 मिलीलीटर
उपरोक्त सभी चीजो को आपस में मिलाकर एक साथ धूप में रख दे जब इसमें पानी जैसा सूख जाए तब बचे हुए तेल को छान लें इस तेल की मालिश से गंजापन दूर होकर बाल आ जाते हैं और बाल झड़ना बंद हो जाते हैं -
अन्य कुछ अदभुत प्रयोग-
बरगद की जटा और काले तिल को बराबर मात्रा में लेकर खूब बारीक पीसकर सिर पर लगायें-इसके आधा घंटे बाद कंघी से बालों को साफ कर ऊपर से भांगरा और नारियल की गिरी दोनों को पीसकर लगाते रहने से बाल कुछ दिन में ही घने और लंबे हो जाते हैं -
बरगद के कड़े हरे शुष्क पत्तों के 10 ग्राम दरदरे चूर्ण को 1 लीटर पानी में पकायें, चौथाई बच जाने पर इसमें 1 ग्राम नमक मिलाकर सुबह-शाम पीने से हर समय
आलस्य और नींद का आना कम हो जाता है-
बरगद के पत्तों की 20 ग्राम राख को 100 मिलीलीटर अलसी के तेल में मिलाकर मालिश करते रहने से सिर के बाल उग आते हैं या बरगद के साफ कोमल पत्तों के रस में, बराबर मात्रा में सरसों के तेल को मिलाकर आग पर पकाकर गर्म कर लें, इस तेल को बालों में लगाने से बालों के सभी रोग दूर हो जाते हैं -
दही के साथ बड़ को पीसकर बने लेप को जले हुए अंग पर लगाने से जलन दूर होती है- जले हुए स्थान पर बरगद की कोपल या कोमल पत्तों को गाय के दही में पीसकर लगाने से जलन कम हो जाती है -
नाक में बरगद के दूध की 2 बूंदें डालने से नकसीर ( नाक से खून बहना) ठीक हो जाती है- 3 ग्राम बरगद की जटा के बारीक पाउडर को दूध की लस्सी के साथ पिलाने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है-
बिवाई की फटी हुई दरारों पर बरगद का दूध भरकर मालिश करते रहने से कुछ ही दिनों में वह ठीक हो जाती है-
बरगद के लाल रंग के कोमल पत्तों को छाया में सुखाकर पीसकर रख लें फिर आधा किलो पानी में इस पाउडर को 1 या आधा चम्मच डालकर पकायें, पकने के बाद थोड़ा सा बचने पर इसमें 3 चम्मच शक्कर मिलाकर सुबह-शाम चाय की तरह पीने से जुकाम और नजला आदि रोग दूर होते हैं और सिर की कमजोरी ठीक हो जाती है-
10 ग्राम बरगद के कोमल हरे रंग के पत्तों को 150 मिलीलीटर पानी में खूब पीसकर छानकर उसमें थोड़ी मिश्री मिलाकर सुबह-शाम 15 दिन तक सेवन करने से दिल की घड़कन सामान्य हो जाती है- बरगद के दूध की 4-5 बूंदे बताशे में डालकर लगभग 40 दिन तक सेवन करने से दिल के रोग में लाभ मिलता है -
कमर दर्द में बरगद़ के दूध की मालिश दिन में 3 बार कुछ दिन करने से कमर दर्द में आराम आता है- बरगद का दूध अलसी के तेल में मिलाकर मालिश करने से कमर दर्द से छुटकरा मिलता है- कमर दर्द में बरगद के पेड़ का दूध लगाने से लाभ होता है-
बरगद के पेड़ के फल को सुखाकर बारीक पाउडर लेकर मिश्री के बारीक पाउडर मिला लें- रोजाना सुबह इस पाउडर को 6 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन से वीर्य का पतलापन, शीघ्रपतन आदि रोग दूर होते हैं -
यदि आप नियमित सूर्योदय से पहले बरगद़ के पत्ते तोड़कर टपकने वाले दूध को एक बताशे में 3-4 बूंद टपकाकर खा लें-एक बार में ऐसा प्रयोग 2-3 बताशे खाकर पूरा करें- हर हफ्ते 2-2 बूंद की मात्रा बढ़ाते हुए 5-6 हफ्ते तक यह प्रयोग जारी रखें- इसके नियमित सेवन से शीघ्रपतन, वीर्य का पतलापन, स्वप्नदोष, प्रमेह, खूनी बवासीर, रक्त प्रदर आदि रोग ठीक हो जाते हैं और यह प्रयोग बलवीर्य वृद्धि के लिए भी बहुत लाभकारी है -
बताशे में बरगद के दूध की 5-10 बूंदे डालकर रोजाना सुबह-शाम खाने से नपुंसकता दूर होती है -
बरगद के पके फल को छाया में सुखाकर पीसकर चूर्ण बना लें- इस चूर्ण को बराबर मात्रा की मिश्री के साथ मिलाकर पीस लें- इसे एक चम्मच की मात्रा में सुबह खाली पेट और सोने से पहले एक कप दूध से नियमित रूप से सेवन करते रहने से कुछ हफ्तों में यौन शक्ति में बहुत लाभ मिलता है -
3-3 ग्राम बरगद के पेड़ की कोंपले (मुलायम पत्तियां ) और गूलर के पेड़ की छाल और 6 ग्राम मिश्री को पीसकर लुगदी सी बना लें फिर इसे तीन बार मुंह में रखकर चबा लें और ऊपर से 250 ग्राम दूध पी लें- 40 दिन तक खाने से वीर्य बढ़ता है और संभोग से खत्म हुई शक्ति लौट आती है -
बरगद के दूध की पहले दिन 1 बूंद 1 बतासे डालकर खायें, दूसरे दिन 2 बतासों पर 2 बूंदे, तीसरे दिन 3 बतासों पर 3 बूंद ऐसे 21 दिनों तक बढ़ाते हुए इसी तरह घटाना शुरू करें- इससे प्रमेह और स्वप्न दोष दूर होकर वीर्य बढ़ने लगता है -
बरगद के फल छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें- गाय के दूध के साथ यह 1 चम्मच चूर्ण खाने से वीर्य गाढ़ा व बलवान बनता है -
25 ग्राम बरगद की कोपलें ( मुलायम पत्तियां ) लेकर 250 मिलीलीटर पानी में पकायें- जब एक चौथाई पानी बचे तो इसे छानकर आधा किलो दूध में डालकर पकायें- इसमें 6 ग्राम ईसबगोल की भूसी और 6 ग्राम चीनी मिलाकर सिर्फ 7 दिन तक पीने से वीर्य गाढ़ा हो जाता है -
बरगद के दूध की 5-7 बूंदे बताशे में भरकर खाने से वीर्य के शुक्राणु बढ़ते है-
बरगद की जटा के साथ अर्जुन की छाल, हरड़, लोध्र व हल्दी को समान मात्रा में लेकर पानी में पीसकर लेप लगाने से उपदंश के घाव भर जाते हैं -
बरगद का दूध उपदंश के फोड़े पर लगा देने से वह बैठ जाती है- बड़ के पत्तों की भस्म (राख ) को पान में डालकर खाने से उपदंश रोग में लाभ होता है -
बरगद के पत्तों से बना काढ़ा 50 मिलीलीटर की मात्रा में 2-3 बार सेवन करने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है- यह काढ़ा सिर के भारीपन, नजला, जुकाम आदि में भी फायदा करता है-
बरगद की जटाओं के बारीक रेशों को पीसकर बने लेप को रोजाना सोते समय स्तनों पर मालिश करके लगाते रहने से कुछ हफ्तों में स्तनों का ढीलापन दूर हो जाता है-
बरगद की जटा के बारीक अग्रभाग के पीले व लाल तन्तुओं को पीसकर लेप करने से स्तनों के ढीलेपन में फायदा होता है -
4 ग्राम बरगद की छाया में सुखाई हुई छाल के चूर्ण को दूध की लस्सी के साथ खाने से गर्भपात नहीं होता है -
बरगद की छाल के काढ़े में 3 से 5 ग्राम लोध्र की लुगदी और थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करने से
गर्भपात में जल्द ही लाभ होता है
पुष्य नक्षत्र और शुक्ल पक्ष में लाये हुए बरगद की कोपलों का चूर्ण 6 ग्राम की मात्रा में मासिक-स्राव काल में प्रात: पानी के साथ 4-6 दिन खाने से स्त्री अवश्य गर्भधारण करती है या बरगद की कोंपलों को पीसकर बेर के जितनी 21 गोलियां बनाकर 3 गोली रोज घी के साथ खाने से भी गर्भधारण करने में आसानी होती है-
बड़ की जटा के अंकुर को घोटकर
गर्भवती स्त्री को पिलाने से सभी प्रकार की उल्टी बंद हो जाती है -
20 ग्राम बरगद के कोमल पत्तों को 100 से 200 मिलीलीटर पानी में घोटकर रक्तप्रदर वाली स्त्री को सुबह-शाम पिलाने से लाभ होता है- स्त्री या पुरुष के पेशाब में खून आता हो तो वह भी बंद हो जाता है -
10 ग्राम बरगद की जटा के अंकुर को 100 मिलीलीटर गाय के दूध में पीसकर और छानकर दिन में 3 बार स्त्री को पिलाने से रक्तप्रदर में लाभ होता है -
बरगद के दूध की 5-7 बूंदे बताशे में भरकर खाने से रक्तप्रदर मिट जाता है -
बरगद के पत्ते, सौंठ, पुरानी ईंट के पाउडर, गिलोय तथा पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण समान मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर लेप करने से भगन्दर के रोग में फायदा होता है -
20 ग्राम बरगद की छाल को 400 मिलीलीटर पानी में पकायें, पकने पर आधा पानी रहने पर छानकर उसमें 10-10 ग्राम गाय का घी और चीनी मिलाकर गर्म ही खाने से कुछ ही दिनों में बादी
बवासीर में लाभ होता है -
बरगद के 25 ग्राम कोमल पत्तों को 200 मिलीलीटर पानी में घोटकर खूनी बवासीर के रोगी को पिलाने से 2-3 दिन में ही खून का बहना बंद होता है बवासीर के मस्सों पर बरगद के पीले पत्तों की राख को बराबर मात्रा में सरसों के तेल में मिलाकर लेप करते रहने से
कुछ ही समय में बवासीर ठीक हो जाती है -
बरगद की सूखी लकड़ी को जलाकर इसके कोयलों को बारीक पीसकर सुबह-शाम 3 ग्राम की मात्रा में ताजे पानी के साथ रोगी को देते रहने से खूनी बवासीर में फायदा होता है - कोयलों के पाउडर को 21 बार धोये हुए मक्खन में मिलाकर मरहम बनाकर बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से बिना किसी दर्द के दूर हो जाते हैं-
खून निकलता है- उसे खूनी दस्त कहते हैं- इसे रोकने के लिए 20 ग्राम बरगद की कोपलें लेकर पीस लें और रात को पानी में भिगोंकर सुबह छान लें फिर इसमें 100 ग्राम घी मिलाकर पकायें- पकने पर घी बचने पर 20-25 ग्राम तक घी में शहद व शक्कर मिलाकर खाने से खूनी दस्त में लाभ होता है -
बरगद के दूध को नाभि के छेद में भरने और उसके आसपास लगाने से अतिसार ( दस्त ) में लाभ होता है- 6 ग्राम बरगद की कोंपलों को 100 मिलीलीटर पानी में घोटकर और छानकर उसमें थोड़ी मिश्री मिलाकर रोगी को पिलाने से और ऊपर से मट्ठा पिलाने से दस्त बंद हो जाते हैं -
बरगद की छाया मे सुखाई गई 3 ग्राम छाल को लेकर पाउड़र बना लें और दिन मे 3 बार चावलों के पानी के साथ या ताजे पानी के साथ लेने से दस्तों में फायदा मिलता है- बरगद की 8-10 कोंपलों को दही के साथ खाने से दस्त बंद हो जाते हैं-
20 ग्राम बरगद की छाल और इसकी जटा को बारीक पीसकर बनाये गये चूर्ण को आधा किलो पानी में पकायें, पकने पर अष्टमांश से भी कम बचे रहने पर इसे उतारकर ठंडा होने पर छानकर खाने से
मधुमेह के रोग में लाभ होता है-
लगभग 24 ग्राम बरगद के पेड़ की छाल लेकर जौकूट करें और उसे आधा लीटर पानी के साथ काढ़ा बना लें- जब चौथाई पानी शेष रह जाए तब उसे आग से उतारकर छाने और ठंडा होने पर पीयें- रोजाना 4-5 दिन तक सेवन से मधुमेह रोग कम हो जाता है- इसका प्रयोग सुबह-शाम करें-
कूठ व सेंधानमक को बरगद के दूध में मिलाकर लेप करें, तथा ऊपर से छाल का पतला टुकड़ा बांध दें, इसे 7 दिन तक 2 बार उपचार करने से बढ़ी हुआ गांठ दूर हो जाती है- गठिया, चोट व मोच पर बरगद का दूध लगाने से दर्द जल्दी कम होता है -
बरगद के पेड़ के दूध को फोड़े पर लगाने से
फोड़ा पककर फूट जाता है -
लगभग 5 ग्राम की मात्रा में बड़ के दूध को सुबह-सुबह पीने से आंव का दस्त समाप्त हो जाता है -
लगभग 3 ग्राम से 6 ग्राम बरगद की जटा का सेवन करने से उल्टी आने का रोग दूर हो जाता है-
30 ग्राम वट की छाल को 1 लीटर पानी में उबालकर गरारे करने से मुंह के छाले खत्म हो जाते हैं -
घाव में कीड़े हो गये हो, बदबू आती हो तो बरगद की छाल के काढ़े से घाव को रोज धोने से इसके दूध की कुछ बूंदे दिन में 3-4 बार डालने से कीड़े खत्म होकर घाव भर जाते हैं-
बरगद के दूध में सांप की केंचुली की राख मिलाकर और उसमें रूई भिगोकर नासूर पर रखें- दस दिन तक इसी प्रकार करने से नासूर में लाभ मिलता है-
अगर घाव ऐसा हो जिसमें कि टांके लगाने की जरूरत पड़ जाती है- तो ऐसे में घाव के मुंह को पिचकाकर बरगद के पत्ते गर्म करके घाव पर रखकर ऊपर से कसकर पट्टी बांधे, इससे 3 दिन में घाव भर जायेगा, ध्यान रहे इस पट्टी को 3 दिन तक न खोलें-
फोड़े-फुन्सियों पर इसके पत्तों को गर्मकर बांधने से वे शीघ्र ही पककर फूट जाते हैं-
बरगद के आधा किलो पत्तों को पीसकर, 4 किलो पानी में रात के समय भिगोकर सुबह ही पका लें- एक किलो पानी बचने पर इसमें आधा किलो सरसों का तेल डालकर दोबारा पकायें, तेल बचने पर छानकर रख लें, इस तेल की मालिश करने से गीली और खुश्क दोनों प्रकार की खुजली दूर होती है -
बरगद की पेड़ की टहनी या इसकी शाखाओं से निकलने वाली जड़ की
दातुन करने से दांत मजबूत होते हैं -
कीड़े लगे या सड़े हुए दांतों में बरगद का दूध लगाने से कीड़े तथा पीड़ा दूर हो जाती है-
10 ग्राम बरगद की छाल, कत्था और 2 ग्राम कालीमिर्च इन तीनों को खूब बारीक पाउडर बनाकर मंजन करने से दांतों का हिलना, मैल, बदबू आदि रोग दूर होकर दांत साफ हो जाते हैं-
दांत के दर्द पर बरगद का दूध लगाने से दर्द दूर हो जाता है- इसके दूध में एक रूई की फुरेरी भिगोकर दांत के छेद में रख देने से दांत की बदबू दूर होकर दांत ठीक हो जाते हैं तथा दांत के कीड़े भी दूर हो जाते हैं -
अगर किसी दांत को निकालना हो तो उस दांत पर बरगद का दूध लगाकर दांत को आसानी से निकाला जा सकता है -
बरगद के पेड़ की जटा से मंजन करने से दांतों के कीड़े खत्म हो जाते हैं बरगद की
कोमल लकड़ी की दातुन से पायरिया खत्म हो जाता है -
बरगद का दूध दांतों में लगाने, मसूढ़ों पर मलने से उनका दर्द दूर हो जाता है बरगद की छाल के काढ़े से कुछ समय तक रोजाना गरारे करने से दांत मजबूत हो जाते हैं -
बरगद के पेड़ का दूध निकालकर दांतों लगाने से दांतों का दर्द खत्म हो जाता है-
बरगद की छाल को पीसकर दांतों के नीचे रखें- इससे दांतों का दर्द खत्म हो जाता है-
दमा के रोगी को बड़ के पत्ते जलाकर उसकी राख 240 मिलीग्राम पान में रखकर खाने से लाभ मिलता है-
बरगद के पत्तों पर घी चुपड़कर बांधने से
सूजन दूर हो जाती है -
गठिया के दर्द में बरगद के दूध में अलसी का तेल मिलाकर मालिश करने से लाभ मिलता है-
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जय हिन्द, वन्दे मातरम् ।

भाषा की गुलामी से आजादी जरूरी है , भाषा की आजादी के बिना आजादी अधूरी है ।

भाषा की गुलामी से आजादी जरूरी है , भाषा की आजादी के बिना आजादी अधूरी है ।

103 देशों में बोले जाने वाली भाषा हिंदी से मात्र 50 देशों में बोली जाने वाली अंग्रेजी से बड़ी कैसे ?
 मात्र 10000 मूल शब्द वाली अंग्रेजी ढाई लाख मूल शब्द वाली हिंदी से बड़ी कैसे ?

 1000 साल से ज्यादा पुरानी भाषा हिंदी से 400 साल पुरानी अंग्रेजी बड़ी कैसे ?
दुनिया मे 35 करोड़ लोग अंग्रेजी बोलते हैं, हिंदी बोलने वाले 1अरब 30 करोड़ हैं ।

केवल 3% भारतीय ही अंग्रेजी जानते हैं और वे 97 प्रतिशत भारतीयों द्वारा बोले जाने वाली भाषाओं को दबाए हुए हैं ।
क्या भारत पर केवल इन 3% लोगों का अधिकार है  ।
सच्चे मायनों में स्वराज तभी आएगा,  जब 97 प्रतिशत भारतीयों को उनकी भाषा में कार्यालयों और न्यायालयों में कार्य करने का,  बोलने का अधिकार मिलेगा ।

जागो भारतीय जागो अंग्रेजी की गुलामी त्यागो ।

🇮🇳स्वदेशी क्रांति🇮🇳

हवाईज़ादा” एवं वैमानिक शास्त्र – कथित बुद्धिजीवियों में इतनी बेचैनी क्यों है? (भाग - १)

हवाईज़ादा” एवं वैमानिक शास्त्र – कथित बुद्धिजीवियों में इतनी बेचैनी क्यों है?
(भाग - १)

By:- सुरेश चिपलूनकर (दो वर्ष पूर्व का लेख)

जैसे ही यह निश्चित हुआ, कि मुम्बई में सम्पन्न होने वाली 102 वीं विज्ञान कांग्रेस में भूतपूर्व फ्लाईट इंजीनियर एवं पायलट प्रशिक्षक श्री आनंद बोडस द्वारा भारतीय प्राचीन विमानों पर एक शोधपत्र पढ़ा जाएगा, तभी यह तय हो गया था कि भारत में वर्षों से विभिन्न अकादमिक संस्थाओं पर काबिज, एक “निहित स्वार्थी बौद्धिक समूह” अपने पूरे दमखम एवं सम्पूर्ण गिरोहबाजी के साथ बोडस के इस विचार पर ही हमला करेगा, और ठीक वैसा ही हुआ भी. एक तो वैसे ही पिछले बारह वर्ष से नरेंद्र मोदी इस “गिरोह” की आँखों में कांटे की तरह चुभते आए हैं, ऐसे में यदि विज्ञान काँग्रेस का उदघाटन मोदी करने वाले हों, इस महत्त्वपूर्ण आयोजन में “प्राचीन वैमानिकी शास्त्र” पर आधारित कोई रिसर्च पेपर पढ़ा जाने वाला हो तो स्वाभाविक है कि इस बौद्धिक गिरोह में बेचैनी होनी ही थी. ऊपर से डॉक्टर हर्षवर्धन ने यह कहकर माहौल को और भी गर्मा दिया कि पायथागोरस प्रमेय के असली रचयिता भारत के प्राचीन ऋषि थे, लेकिन उसका “क्रेडिट” पश्चिमी देश ले उड़े हैं.

खैर... बात हो रही थी वैमानिकी शास्त्र की... सभी विद्वानों में कम से कम इस बात को लेकर दो राय नहीं हैं कि महर्षि भारद्वाज द्वारा वैमानिकी शास्त्र लिखा गया था. इस शास्त्र की रचना के कालखंड को लेकर विवाद किया जा सकता है, लेकिन इतना तो निश्चित है कि जब भी यह लिखा गया होगा, उस समय तक हवाई जहाज़ का आविष्कार करने का दम भरने वाले “राईट ब्रदर्स” की पिछली दस-बीस पीढियाँ पैदा भी नहीं हुई होंगी. ज़ाहिर है कि प्राचीन काल में विमान भी था, दूरदर्शन भी था (महाभारत-संजय प्रकरण), अणु बम (अश्वत्थामा प्रकरण) भी था, प्लास्टिक सर्जरी (सुश्रुत संहिता) भी थी। यानी वह सब कुछ था, जो आज है, लेकिन सवाल तो यह है कि वह सब कहां चला गया? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों साल पहले जिन बातों की “कल्पना”(?) की गई थी, ठीक उसी प्रकार एक के बाद एक वैज्ञानिक आविष्कार हुए? अर्थात उस प्राचीन काल में उन्नत टेक्नोलॉजी तो मौजूद थी, वह किसी कारणवश लुप्त हो गई. जब तक इस बारे में पक्के प्रमाण सामने नहीं आते, उसे शेष विश्व द्वारा मान्यता नहीं दी जाएगी. “प्रगतिशील एवं सेकुलर-वामपंथी गिरोह” द्वारा इसे वैज्ञानिक सोच नहीं माना जाएगा, “कोरी गप्प” माना जाएगा... फिर सच्चाई जानने का तरीका क्या है? इन शास्त्रों का अध्ययन हो, उस संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार किया जाए, जिसमें ये शास्त्र या ग्रन्थ लिखे गए हैं. चरक, सुश्रुत वगैरह की बातें किसी दूसरे लेख में करेंगे, तो आईये संक्षिप्त में देखें कि महर्षि भारद्वाज लिखित “वैमानिकी शास्त्र” पर कम से कम विचार किया जाना आवश्यक क्यों है... इसको सिरे से खारिज क्यों नहीं किया जा सकता.


जब भी कोई नया शोध या खोज होती है, तो उस आविष्कार का श्रेय सबसे पहले उस “विचार” को दिया जाना चाहिए, उसके बाद उस विचार से उत्पन्न हुई आविष्कार के सबसे पहले “प्रोटोटाइप” को महत्त्व दिया जाना चाहिए. लेकिन राईट बंधुओं के मामले में ऐसा नहीं किया गया. शिवकर बापूजी तलपदे ने इसी वैमानिकी शास्त्र का अध्ययन करके सबसे पहला विमान बनाया था, जिसे वे सफलतापूर्वक 1500 फुट की ऊँचाई तक भी ले गए थे, फिर जिस “आधुनिक विज्ञान” की बात की जाती है, उसमें महर्षि भारद्वाज न सही शिवकर तलपदे को सम्मानजनक स्थान हासिल क्यों नहीं है? क्या सबसे पहले विमान की अवधारणा सोचना और उस पर काम करना अदभुत उपलब्धि नहीं है? क्या इस पर गर्व नहीं होना चाहिए? क्या इसके श्रेय हेतु दावा नहीं करना चाहिए? फिर यह सेक्यूलर गैंग बारम्बार भारत की प्राचीन उपलब्धियों को लेकर शेष भारतीयों के मन में हीनभावना क्यों रखना चाहती है?

अंग्रेज शोधकर्ता डेविड हैचर चिल्द्रेस ने अपने लेख Technology of the Gods – The Incredible Sciences of the Ancients (Page 147-209) में लिखते हैं कि हिन्दू एवं बौद्ध सभ्यताओं में हजारों वर्ष से लोगों ने प्राचीन विमानों के बारे सुना और पढ़ा है. महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित “यन्त्र-सर्वस्व” में इसे बनाने की विधियों के बारे में विस्तार से लिखा गया है. इस ग्रन्थ को चालीस उप-भागों में बाँटा गया है, जिसमें से एक है “वैमानिक प्रकरण, जिसमें आठ अध्याय एवं पाँच सौ सूत्र वाक्य हैं. महर्षि भारद्वाज लिखित “वैमानिक शास्त्र” की मूल प्रतियाँ मिलना तो अब लगभग असंभव है, परन्तु सन 1952 में महर्षि दयानंद के शिष्य स्वामी ब्रह्ममुनी परिव्राजक द्वारा इस मूल ग्रन्थ के लगभग पाँच सौ पृष्ठों को संकलित एवं अनुवादित किया गया था, जिसकी पहली आवृत्ति फरवरी 1959 में गुरुकुल कांगड़ी से प्रकाशित हुई थी. इस आधी-अधूरी पुस्तक में भी कई ऐसी जानकारियाँ दी गई हैं, जो आश्चर्यचकित करने वाली हैं.

इसी लेख में डेविड हैचर लिखते हैं कि प्राचीन भारतीय विद्वानों ने विभिन्न विमानों के प्रकार, उन्हें उड़ाने संबंधी “मैनुअल”, विमान प्रवास की प्रत्येक संभावित बात एवं देखभाल आदि के बारे में विस्तार से “समर सूत्रधार” नामक ग्रन्थ में लिखी हैं. इस ग्रन्थ में लगभग 230 सूत्रों एवं पैराग्राफ की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ हैं. डेविड आगे कहते हैं कि यदि यह सारी बातें उस कालखंड में लिखित एवं विस्तृत स्वरूप में मौजूद थीं तो क्या ये कोरी गल्प थीं? क्या किसी ऐसी “विशालकाय वस्तु” की भौतिक मौजूदगी के बिना यह सिर्फ कपोल कल्पना हो सकती है? परन्तु भारत के परम्परागत इतिहासकारों तथा पुरातत्त्ववेत्ताओं ने इस “कल्पना”(?) को भी सिरे से खारिज करने में कोई कसर बाकी न रखी. एक और अंग्रेज लेखक एंड्रयू टॉमस लिखते हैं कि यदि “समर सूत्रधार” जैसे वृहद एवं विस्तारित ग्रन्थ को सिर्फ कल्पना भी मान लिया जाए, तो यह निश्चित रूप से अब तक की सर्वोत्तम कल्पना या “फिक्शन उपन्यास” माना जा सकता है. टॉमस सवाल उठाते हैं कि रामायण एवं महाभारत में भी कई बार “विमानों” से आवागमन एवं विमानों के बीच पीछा अथवा उनके आपसी युद्ध का वर्णन आता है. इसके आगे मोहन जोदड़ो एवं हडप्पा के अवशेषों में भी विमानों के भित्तिचित्र उपलब्ध हैं. इसे सिर्फ काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए था. पिछले चार सौ वर्ष की गुलामी के दौर ने कथित बौद्धिकों के दिलो-दिमाग में हिंदुत्व, संस्कृत एवं प्राचीन ग्रंथों के नाम पर ऐसी हीन ग्रंथि पैदा कर दी है, उन्हें सिर्फ अंग्रेजों, जर्मनों अथवा लैटिनों का लिखा हुआ ही परम सत्य लगता है. इन बुद्धिजीवियों को यह लगता है कि दुनिया में सिर्फ ऑक्सफोर्ड और हारवर्ड दो ही विश्वविद्यालय हैं, जबकि वास्तव में हुआ यह था कि प्राचीन तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय जहाँ आक्रान्ताओं द्वारा भीषण अग्निकांड रचे गए अथवा सैकड़ों घोड़ों पर संस्कृत ग्रन्थ लादकर अरब, चीन अथवा यूरोप ले जाए गए. हाल-फिलहाल इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा बिना किसी शोध अथवा सबूत के संस्कृत ग्रंथों एवं लुप्त हो चुकी पुस्तकों/विद्याओं पर जो हाय-तौबा मचाई जा रही है, वह इसी गुलाम मानसिकता का परिचायक है.


इन लुप्त हो चुके शास्त्रों, ग्रंथों एवं अभिलेखों की पुष्टि विभिन्न शोधों द्वारा की जानी चाहिए थी कि आखिर यह तमाम ग्रन्थ और संस्कृत की विशाल बौद्धिक सामग्री कहाँ गायब हो गई? ऐसा क्या हुआ था कि एक बड़े कालखण्ड के कई प्रमुख सबूत गायब हैं? क्या इनके बारे में शोध करना, तथा तत्कालीन ऋषि-मुनियों एवं प्रकाण्ड विद्वानों ने यह “कथित कल्पनाएँ” क्यों की होंगी? कैसे की होंगी? उन कल्पनाओं में विभिन्न धातुओं के मिश्रण अथवा अंतरिक्ष यात्रियों के खान-पान सम्बन्धी जो नियम बनाए हैं वह किस आधार पर बनाए होंगे, यह सब जानना जरूरी नहीं था? लेकिन पश्चिम प्रेरित इन इतिहासकारों ने सिर्फ खिल्ली उड़ाने में ही अपना वक्त खराब किया है और भारतीय ज्ञान को बर्बाद करने की सफल कोशिश की है.

ऑक्सफोर्ड विवि के ही एक संस्कृत प्रोफ़ेसर वीआर रामचंद्रन दीक्षितार अपनी पुस्तक “वार इन द एन्शियेंट इण्डिया इन 1944” में लिखते हैं कि आधुनिक वैमानिकी विज्ञान में भारतीय ग्रंथों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. उन्होंने बताया कि सैकड़ों गूढ़ चित्रों द्वारा प्राचीन भारतीय ऋषियों ने पौराणिक विमानों के बारे में लिखा हुआ है. दीक्षितार आगे लिखते हैं कि राम-रावण के युद्ध में जिस “सम्मोहनास्त्र” के बारे में लिखा हुआ है, पहले उसे भी सिर्फ कल्पना ही माना गया, लेकिन आज की तारीख में जहरीली गैस छोड़ने वाले विशाल बम हकीकत बन चुके हैं. पश्चिम के कई वैज्ञानिकों ने प्राचीन संस्कृत एवं मोड़ी लिपि के ग्रंथों का अनुवाद एवं गहन अध्ययन करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि निश्चित रूप से भारतीय मनीषियों/ऋषियों को वैमानिकी का वृहद ज्ञान था. यदि आज के भारतीय बुद्धिजीवी पश्चिम के वैज्ञानिकों की ही बात सुनते हैं तो उनके लिए चार्ल्स बर्लित्ज़ का नाम नया नहीं होगा. प्रसिद्ध पुस्तक “द बरमूडा ट्राएंगल” सहित अनेक वैज्ञानिक पुस्तकें लिखने वाले चार्ल्स बर्लित्ज़ लिखते हैं कि, “यदि आधुनिक परमाणु युद्ध सिर्फ कपोल कल्पना नहीं वास्तविकता है, तो निश्चित ही भारत के प्राचीन ग्रंथों में ऐसा बहुत कुछ है जो हमारे समय से कहीं आगे है”. 400 ईसा पूर्व लिखित “ज्योतिष” ग्रन्थ में ब्रह्माण्ड में धरती की स्थिति, गुरुत्वाकर्षण नियम, ऊर्जा के गतिकीय नियम, कॉस्मिक किरणों की थ्योरी आदि के बारे में बताया जा चुका है. “वैशेषिका ग्रन्थ” में भारतीय विचारकों ने परमाणु विकिरण, इससे फैलने वाली विराट ऊष्मा तथा विकिरण के बारे में अनुमान लगाया है. (स्रोत :- Doomsday 1999 – By Charles Berlitz, पृष्ठ 123-124).

इसी प्रकार कलकत्ता संस्कृत कॉलेज के संस्कृत प्रोफ़ेसर दिलीप कुमार कांजीलाल ने 1979 में Ancient Astronaut Society की म्यूनिख (जर्मनी) में सम्पन्न छठवीं काँग्रेस के दौरान उड़ सकने वाले प्राचीन भारतीय विमानों के बारे में एक उदबोधन दिया एवं पर्चा प्रस्तुत किया था (सौभाग्य से उस समय वहाँ सतत खिल्ली उड़ाने वाले, आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी नहीं थे). प्रोफ़ेसर कांजीलाल के अनुसार ईसा पूर्व 500 में “कौसितकी” एवं “शतपथ ब्रह्मण” नामक कम से कम दो और ग्रन्थ थे, जिसमें अंतरिक्ष से धरती पर देवताओं के उतरने का उल्लेख है. यजुर्वेद में उड़ने वाले यंत्रों को “विमान” नाम दिया गया, जो “अश्विन” उपयोग किया करते थे. इसके अलावा भागवत पुराण में भी “विमान” शब्द का कई बार उल्लेख हुआ है. ऋग्वेद में “अश्विन देवताओं” के विमान संबंधी विवरण बीस अध्यायों (1028 श्लोकों) में समाया हुआ है, जिसके अनुसार अश्विन जिस विमान से आते थे, वह तीन मंजिला, त्रिकोणीय एवं तीन पहियों वाला था एवं यह तीन यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम था. कांजीलाल के अनुसार, आधे-अधूरे स्वरूप में हासिल हुए वैमानिकी संबंधी इन संस्कृत ग्रंथों में उल्लिखित धातुओं एवं मिश्रणों का सही एवं सटीक अनुमान तथा अनुवाद करना बेहद कठिन है, इसलिए इन पर कोई विशेष शोध भी नहीं हुआ. “अमरांगण-सूत्रधार” ग्रन्थ के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर एवं इंद्र के अलग-अलग पाँच विमान थे. आगे चलकर अन्य ग्रंथों में इन विमानों के चार प्रकार रुक्म, सुंदरा, त्रिपुर एवं शकुन के बारे में भी वर्णन किया गया है, जैसे कि “रुक्म” शंक्वाकार विमान था जो स्वर्ण जड़ित था, जबकि “त्रिपुर विमान” तीन मंजिला था. महर्षि भारद्वाज रचित “वैमानिकी शास्त्र” में यात्रियों के लिए “अभ्रक युक्त” (माएका) कपड़ों के बारे में बताया गया है, और जैसा कि हम जानते हैं आज भी अग्निरोधक सूट में माईका अथवा सीसे का उपयोग होता है, क्योंकि यह ऊष्मारोधी है.



भारत के मौजूदा मानस पर पश्चिम का रंग कुछ इस कदर चढ़ा है कि हममें से अधिकांश अपनी खोज या किसी रचनात्मक उपलब्धि पर विदेशी ठप्पा लगते देखना चाहते हैं. इसके बाद हम एक विशेष गर्व अनुभव करते हैं. ऐसे लोगों के लिए मैं प्राचीन भारतीय विमान के सन्दर्भ में एरिक वॉन डेनिकेन की खोज के बारे में बता रहा हूँ उससे पहले एरिक वॉन डेनिकेन का परिचय जरुरी है. 79 वर्षीय डेनिकेन एक खोजी और बहुत प्रसिद्ध लेखक हैं. उनकी लिखी किताब 'चेरिएट्स ऑफ़ द गॉड्स' बेस्ट सेलर रही है. डेनिकेन की खूबी हैं कि उन्होंने प्राचीन इमारतों और स्थापत्य कलाओं का गहन अध्ययन किया और अपनी थ्योरी से साबित किया है कि पूरे विश्व में प्राचीन काल में एलियंस (परग्रही) पृथ्वी पर आते-जाते रहे हैं. एरिक वॉन डेनिकेन 1971 में भारत में कोलकाता गए थे. वे अपनी 'एंशिएंट एलियंस थ्योरी' के लिए वैदिक संस्कृत में कुछ तलाशना चाहते थे. डेनिकेन यहाँ के एक संस्कृत कालेज में गए. यहाँ उनकी मुलाकात इन्हीं प्रोफ़ेसर दिलीप कंजीलाल से हुई थी. प्रोफ़ेसर ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का आधुनिकीकरण किया है. देवताओं के विमान यात्रा वृतांत ने वोन को खासा आकर्षित किया. वोन ने माना कि ये वैदिक विमान वाकई में नटबोल्ट से बने असली एयर क्राफ्ट थे. उन्हें हमारे मंदिरों के आकार में भी विमान दिखाई दिए. उन्होंने जानने के लिए लम्बे समय तक शोध किया कि भारत में मंदिरों का आकार विमान से क्यों मेल खाता है?  उनके मुताबिक भारत के पूर्व में कई ऐसे मंदिर हैं जिनमे आकाश में घटी खगोलीय घटनाओ का प्रभाव साफ़ दिखाई देता है. वॉन के मुताबिक ये खोज का विषय है कि आख़िरकार मंदिर के आकार की कल्पना आई कहाँ से? इसके लिए विश्व के पहले मंदिर की खोज जरुरी हो जाती है और उसके बाद ही पता चल पायेगा कि विमान के आकार की तरह मंदिरों के स्तूप या शिखर क्यों बनाये गए थे? हम आज उसी उन्नत तकनीक की तलाश में जुटे हैं जो कभी भारत के पास हुआ करती थी.

चूँकि यह लेख एक विस्तृत विषय पर है, इसलिए इसे दो भागों में पेश करने जा रहा हूँ... शेष दूसरे भाग में... जल्दी ही... नमस्कार.

हवाईजादा एवं वैमानिकी शास्त्र (भाग २)

हवाईजादा एवं वैमानिकी शास्त्र (भाग २)

By :- सुरेश चिपलूनकर

पहले भाग से आगे जारी...

अमरांगण-सूत्रधार में 113 उपखंडों में इन चारों विमान प्रकारों के बारे में पायलट ट्रेनिंग, विमान की उड़ान का मार्ग तथा इन विशाल यंत्रों के भिन्न-भिन्न भागों का विवरण आदि बारीक से बारीक जानकारी दी गई है. भीषण तापमान सहन कर सकने वाली सोलह प्रकार की धातुओं के बारे में भी इसमें बताया गया है, जिसे चाँदी के साथ सही अनुपात में “रस” मिलाकर बनाया जाता है (इस “रस” शब्द के बारे में किसी को पता नहीं है कि आखिर यह रस क्या है? कहाँ मिलता है या कैसे बनाया जाता है). ग्रन्थ में इन धातुओं का नाम ऊष्णन्भरा, ऊश्नप्पा, राज्मालात्रित जैसे कठिन नाम हैं, जिनका अंग्रेजी में अनुवाद अथवा इन शब्दों के अर्थ अभी तक किसी को समझ में नहीं आए हैं. पश्चिम प्रेरित जो कथित बुद्धिजीवी बिना सोचे-समझे भारतीय संस्कृति एवं ग्रंथों की आलोचना करते एवं मजाक उड़ाते हैं, उन्होंने कभी भी इसका जवाब देने अथवा खोजने की कोशिश नहीं की, कि आखिर विमान शास्त्र के बारे में जो इतना कुछ लिखा है क्या उसे सिर्फ काल्पनिकता कहकर ख़ारिज करना चाहिए?




1979 में आई एक और पुस्तक “Atomic Destruction 2000”, जिसके लेखक डेविड डेवनपोर्ट हैं, ने दावा किया कि उनके पास इस बात के पूरे सबूत हैं कि मोहन जोदड़ो सभ्यता का नाश परमाणु बम से हुआ था. मोहन जोदड़ो सभ्यता पाँच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता थी, जो इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं थी. लगभग डेढ़ किमी के दायरे में अपनी खोज को जारी रखते हुए डेवनपोर्ट ने यह बताया कि यहाँ पर कोई न कोई ऐसी घटना हुई थी जिसमें तापमान 2000 डिग्री तक पहुँच गया था. मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिलने वाले मानव अवशेष सीधे जमीन पर लेटे हुए मिलते हैं, जो किसी प्राकृतिक आपदा की तरफ नहीं, बल्कि “अचानक आई हुई मृत्यु” की तरफ इशारा करता है. मुझे पूरा विश्वास है कि यह परमाणु बम ही था. स्वाभाविक है कि जब पाँच हजार साल पहले यह एक परमाणु बम आपदा थी, अर्थात उड़ने वाले कोई यंत्र तो होंगे ही. डेवनपोर्ट आगे लिखते हैं कि चूँकि ऐसे प्रागैतिहासिक स्थानों पर उनकी गहन जाँच करने की अनुमति आसानी से नहीं मिलती, इसलिए मुझे काम बन्द करना पड़ा, लेकिन तत्कालीन रासायनिक विशेषज्ञों, भौतिकविदों तथा धातुविदों द्वारा मोहन जोदड़ो की और गहन जाँच करना आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और उस पर पर्दा डाल दिया गया.

एरिक वॉन डेनिकन अपनी बेस्टसेलर पुस्तक “चैरियट्स ऑफ गॉड्स (पृष्ठ 56-60) में लिखते हैं, “उदाहरण के तौर पर लगभग पाँच हजार वर्ष पुरानी महाभारत के तत्कालीन कालखण्ड में कोई योद्धा किसी ऐसे अस्त्र के बारे में कैसे जानता था, जिसे चलाने से बारह साल तक उस धरती पर सूखा पड़ जाता, ऐसा कोई अस्त्र जो इतना शक्तिशाली हो कि वह माताओं के गर्भ में पलने वाले शिशु को भी मार सके?” इसका अर्थ है कि ऐसा कुछ ना कुछ तो था, जिसका ज्ञान आगे नहीं बढ़ाया गया, अथवा लिपिबद्ध नहीं हुआ और गुम हो गया. यदि कुछ देर के लिए हम इसे “काल्पनिक” भी मान लें, तब भी महाभारत काल में कोई योद्धा किसी ऐसे रॉकेटनुमा यंत्र के बारे में ही कल्पना कैसे कर सकता है, जो किसी वाहन पर रखा जा सके और जिससे बड़ी जनसँख्या का संहार किया जा सके? महाभारत के ही एक प्रसंग में ऐसे अस्त्र का भी उल्लेख है, जिसे चलाने के बाद धातु की ढाल एवं वस्त्र भी पिघल जाते हैं, घोड़े-हाथी पागल होकर इधर-उधर दौड़ने लगते हैं, रथों में आग लग जाती है और शत्रुओं के बाल झड़ने लगते हैं, नाखून गिरने लगते हैं. यह किस तरफ इशारा करता है? क्या इसके बारे में शोध नहीं किया जाना चाहिए था? आखिर वेदव्यास को यह कल्पनाएँ कहाँ से सूझीं? आखिर संजय किस तकनीक के सहारे धृतराष्ट्र को युद्ध का सीधा प्रसारण सुना रहा था? अभिमन्यु ने सुभद्रा के गर्भ में चक्रव्यूह भेदने की तकनीक सुभद्रा के जागृत अवस्था में रहने तक ही क्यों सुनी? (यह तो अब वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हुआ है कि गर्भस्थ शिशु सुन-समझ सकता है, फिर प्राचीन ग्रंथों की खिल्ली उड़ाने का हमें क्या अधिकार है?).
एक और पश्चिमी लेखक जीआर जोसियर ने अपने एक लेख (The Pilot is one who knows the secrets) में वैमानिकी शास्त्र से संबद्ध एक अन्य ग्रन्थ “रहस्य लहरी” से उद्धृत किया है कि प्राचीन भारतीय वैमानिकी शास्त्र में पायलटों को बत्तीस प्रकार के रहस्य ज्ञात होना आवश्यक था. इन रहस्यों में से कुछ का नाम इस प्रकार है – गूढ़, दृश्य, विमुख, रूपाकर्षण, स्तब्धक, चपल, पराशब्द ग्राहक आदि. जैसा कि इन सरल संस्कृत शब्दों से ही स्पष्ट हो रहा है कि यह तमाम रहस्य या ज्ञान पायलटों को शत्रु विमानों से सावधान रहने तथा उन्हें मार गिराने के लिए दिए जाते थे. “शौनक” ग्रन्थ के अनुसार अंतरिक्ष को पाँच क्षेत्रों में बाँटा गया था – रेखापथ, मंडल, कक्षाय, शक्ति एवं केन्द्र. इसी प्रकार इन पाँच क्षेत्रों में विमानों की उड़ान हेतु 5,19,800 मार्ग निर्धारित किए गए थे. यह विमान सात लोकों में जाते थे जिनके नाम हैं – भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महालोक, जनोलोक, तपोलोक एवं सत्यलोक. जबकि “धुंडीनाथ एवं वाल्मीकी गणित” के अनुसार विमानों के उड़ान मार्ग 7,03,00,800 निर्धारित किए गए थे, जिसमें से “मंडल” में 20,08,00200 मार्ग, कक्षाय में 2,09,00,300 मार्ग, शक्ति में 10,01,300 मार्ग तथा केन्द्र में 30,08,200 मार्ग निर्धारित किए हुए.

लेख में ऊपर एक स्थान पर यह बात आई है कि संस्कृत एवं कहीं-कहीं दूसरी गूढ़ भाषाओं में लिखे ग्रंथों की भाषा एवं रहस्य समझ नहीं आते, इसलिए यह बोझिल एवं नीरस लगने लगते हैं, परन्तु उन शब्दों का एक निश्चित अर्थ था. एक संक्षिप्त उदाहरण देकर यह लेख समाप्त करता हूँ. हम लोगों ने बचपन में “बैटरी” (डेनियल सेल) के बारे में पढ़ा हुआ है, उसके “आविष्कारक”(?) और एम्पीयर तथा वोल्ट को ही हम इकाई मानते आए हैं, परन्तु वास्तव में “बैटरी” की खोज सप्तर्षियों में से एक महर्षि अगस्त्य हजारों वर्ष पहले ही कर चुके हैं. महर्षि ने “अगस्त्य संहिता” नामक ग्रन्थ लिखा है. इन संस्कृत ग्रंथों के शब्दों को ण समझ पाने की एक मजेदार सत्य घटना इस प्रकार है. राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में पूना से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की। भारत में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास “अगस्त्य संहिता” के कुछ पन्ने मिले। इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा। महर्षि अगस्त्य ने अगस्त्य संहिता में विधुत उत्पादन से सम्बंधित सूत्रों में लिखा :
संस्थाप्य मृण्मये पात्रे
ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन
चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥

अर्थात एक मिट्टी का पात्र (Earthen pot) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (copper sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगायें, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो, उससे “मित्रावरुणशक्ति” (अर्थात बिजली) का उदय होगा। अब थोड़ी सी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हुई | उपर्युक्त वर्णन के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने तैयारी चालू की तो शेष सामग्री तो ध्यान में आ गई, परन्तु शिखिग्रीवा समझ में नहीं आया। संस्कृत कोष में देखने पर ध्यान में आया कि “शिखिग्रीवा” याने मोर की गर्दन। अत: वे और उनके मित्र बाग में गए, तथा वहां के प्रमुख से पूछा, क्या आप बता सकते हैं, आपके बाग में मोर कब मरेगा, तो उसने नाराज होकर कहा क्यों? तब उन्होंने कहा, एक प्रयोग के लिए उसकी गरदन की आवश्यकता है। यह सुनकर उसने कहा ठीक है। आप एक अर्जी दे जाइये। इसके कुछ दिन बाद प्रोफ़ेसर साहब की एक आयुर्वेदाचार्य से बात हो रही थी। उनको यह सारा घटनाक्रम सुनाया तो वे हंसने लगे और उन्होंने कहा, यहां शिखिग्रीवा का अर्थ “मोर की गरदन” नहीं अपितु उसकी गरदन के रंग जैसा पदार्थ अर्थात कॉपर सल्फेट है। यह जानकारी मिलते ही समस्या हल हो गई और फिर इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजीटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा। परिणामस्वरूप 1.138 वोल्ट तथा 23 mA धारा वाली विद्युत उत्पन्न हुई। प्रयोग सफल होने की सूचना डा. एम.सी. सहस्रबुद्धे को दी गई। इस सेल का प्रदर्शन ७ अगस्त, १९९० को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ।
आगे महर्षि अगस्त्य लिखते है :

अनने जलभंगोस्ति प्राणो
दानेषु वायुषु।
एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥
अर्थात सौ कुंभों की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे, तो पानी अपने रूप को बदल कर प्राण वायु (Oxygen) तथा उदान वायु (Hydrogen) में परिवर्तित हो जाएगा।

आगे लिखते है:
वायुबन्धकवस्त्रेण
निबद्धो यानमस्तके
उदान : स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌। (अगस्त्य संहिता शिल्प शास्त्र सार)

उदान वायु (H2) को वायु प्रतिबन्धक वस्त्र (गुब्बारा) में रोका जाए तो यह विमान विद्या में काम आता है। राव साहब वझे, जिन्होंने भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथ और प्रयोगों को ढूंढ़ने में अपना जीवन लगाया, उन्होंने अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों में पाया कि विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार पर उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे गयें है:

(१) तड़ित्‌ - रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न।
(२) सौदामिनी - रत्नों के घर्षण से उत्पन्न।
(३) विद्युत - बादलों के द्वारा उत्पन्न।
(४) शतकुंभी - सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न।
(५) हृदनि - हृद या स्टोर की हुई बिजली।
(६) अशनि - चुम्बकीय दण्ड से उत्पन्न।

अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पालिश चढ़ाने की विधि निकाली। अत: महर्षि अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) भी कहते हैं।
आगे लिखा है:
कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते। -शुक्र नीति
यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रं
स्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रं
शातकुंभमिति स्मृतम्‌॥ ५ (अगस्त्य संहिता)

अर्थात्‌- कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है।
उपरोक्त विधि का वर्णन एक विदेशी लेखक David Hatcher Childress ने अपनी पुस्तक " Technology of the Gods: The Incredible Sciences of the Ancients" में भी लिखा है । अब मजे की बात यह है कि हमारे ग्रंथों को विदेशियों ने हम से भी अधिक पढ़ा है । इसीलिए दौड़ में आगे निकल गये और सारा श्रेय भी ले गये। आज हम विभवान्तर की इकाई वोल्ट तथा धारा की एम्पीयर लिखते है जो क्रमश: वैज्ञानिक Alessandro Volta तथा André-Marie Ampère के नाम पर रखी गयी है | जबकि इकाई अगस्त्य होनी चाहिए थी... जो “गुलाम बुद्धिजीवियों” ने होने नहीं दी.
अब सवाल उठता है कि, यदि प्राचीन भारतीय ज्ञान इतना समृद्ध था तो वह कहाँ गायब हो गया? पश्चिम के लोग उसी ज्ञान पर शोध एवं विकास करके अपने आविष्कार क्यों और कैसे बनाते रहे? संस्कृत ज्ञान एवं शिक्षा के प्रति इतनी उदासीनता क्यों बनी रही? इसके जवाब निम्नलिखित हैं -

(अ)  पहला यह कि, भारतीय संस्कृति इतिहास की सर्वाधिक “ज़ख़्मी सभ्यता” रही है. मशहूर लेखक वीएस नायपॉल ने भी इसे “India: A Wounded Civilization” माना है. तुर्क, मुग़ल, अंग्रेज और फिर कांग्रेस। हम निरंतर हमलो के शिकार हुए हैं. जिससे संस्कृत एवं प्राचीन वैज्ञानिक विरासतें व विज्ञान संभल पाना बेहद मुश्किल रहा होगा.
(आ)    दूसरा यह कि, भारतीय मनीषियों ने वेद आदि जो भी लिखे वह श्रुति परम्परा के सहारे आगे बढ़ा. अब्राहमिक धर्मो की तरह “व्यवस्थित इतिहास लेखन” की परम्परा नहीं रही. यह भी एक कारण है की हमारे नवोन्मेष/ आविष्कार नष्ट हो गये. इसलिए कुछ तो लिखित अवस्था में है, जबकि कुछ सिर्फ कंठस्थ था, जो तीन-चार पीढ़ियों बाद स्वमेव नष्ट हो गया. रही-सही कसर आक्रान्ताओं के हमलों, मंदिरों (जहाँ अधिकाँश ग्रन्थ रखे जाते थे) की लूटपाट एवं नष्ट करने तथा नालन्दा जैसी विराट लाईब्रेरियों को जलाने आदि के कारण संभवतः यह गायब हुए होंगे.
(इ)      तीसरा, सभी जानते हैं कि भारतीय समाज अध्यात्म उन्मुख रहा है. जिससे भौतिक आविष्कारो के प्रति उदासीनता रही है. श्रेय लेना अथवा ज्ञान से “कमाई करना” स्वभाव में ही नहीं रहा.
(ई)      चौथा, जब सिर्फ 60 साल के सेकुलरी कांग्रेसी शासन में ही योग, संस्कृत, आयुर्वेद आदि विरासतों को दयनीय मुकाम पर पहुंचाया जा सकता है, तो सैकड़ो वर्षों की विदेशी गुलामी की मारक शक्ति का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
(उ)      पांचवी बात - कॉपीराइट, पेटेंट जैसे चोंचलो से मुक्त होने के कारण हमारी विरासतें यूरोप के मुल्को ने अपनी बपौती बना ली है. ये हालत आज भी है. (उदाहरण हल्दी और नीम). सैकड़ो वर्षो पूर्व हमारे पूर्वजो ने कितना ज्ञान मुफ्त बांटा होगा और कितना इन विदेशियो ने चुराया होगा वह कल्पना से परे है. सनातन सत्य ये है कि न तो पहले हमें प्रतिभाओ की कदर थी, ना आज. वरना Brain Drain न होता!

कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि “वैमानिकी शास्त्र” एवं प्राचीन ग्रंथों में भारतीय विमान विज्ञान की हँसी उड़ाने, खारिज करने एवं सत्य को षड्यंत्रपूर्वक दबाने की कोशिशें बन्द होनी चाहिए एवं इस दिशा में गंभीर शोध प्रयास किए जाने चाहिए. ज़ाहिर है कि यह कार्य पूर्वाग्रह से ग्रसित “गुलाम मानसिकता” वाले प्रगतिशील लेखक नहीं कर सकते. इस विराट कार्य के लिए केन्द्र सरकार को ही महती पहल करनी होगी. जिन विद्वानों को भारतीय संस्कृति पर भरोसा है, संस्कृत में जिनकी आस्था है एवं जिनकी सोच अंग्रेजी अथवा मार्क्स की "गर्भनाल" से जुडी हुई ना हो, ऐसे लोगों के समूह बनाकर सभी प्रमुख ग्रंथों के बारे में शोध एवं तथ्यान्वेषण किया जाना चाहिए.

समाप्त...

प्रकृति का एक वरदान है ' बरगद '

प्रकृति का एक वरदान है ' बरगद ' ये कभी नष्ट नहीं होता है बरगद का वृक्ष घना एवं फैला हुआ होता है इसकी शाखाओं से जड़ें निकलकर हवा ...